<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544</id><updated>2012-01-14T18:16:21.939+05:30</updated><category term='आरक्षण'/><category term='दादाजी'/><category term='नगर'/><category term='शिक्षा'/><category term='नदी'/><category term='घर'/><category term='शोषण'/><category term='चुटकुला'/><category term='भजन'/><category term='प्रशिक्षण'/><category term='ग़ज़ल'/><category term='गंगा'/><category term='वाहनचालन'/><category term='कारखाना'/><category term='पूजा-पाठ'/><category term='कार'/><category term='महादलित'/><category term='प्रदूषण'/><category term='ग़ुलाम अली'/><category term='बिहार'/><category term='पुस्तक'/><title type='text'>मेरे विचार</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>15</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-3121143382970536573</id><published>2012-01-07T21:33:00.001+05:30</published><updated>2012-01-08T03:23:16.435+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शोषण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आरक्षण'/><title type='text'>अनूसूचित जाति-जनजाति हेतु आरक्षण</title><content type='html'>आरक्षण एक विवादास्पद विषय है। पिछले 3-4 दशकों में यह भारत की राजनीति का अहम् हिस्सा भी है। पिछले दो दशकों में कई पार्टियों ने (केन्द्र और राज्य दोनों में) तो मात्र आरक्षण को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता है और सरकार बनाई है। इसमें लालू जी की बिहार में सरकार, 90 की वी.पी. सिन्ह की केन्द्र सरकार और कौन्ग्रेस की केन्द्र व राज्य सरकारें (जैसे आन्ध्रप्रदेश) शामिल हैं। बिहार में नीतीश जी ने विधायिका में आरक्षण को स्वीकृति दी है (यह संसद और लगभग सारे राज्यों में लागू है, पढिए &lt;a href="http://evichar.blogspot.com/2012/01/blog-post.html" target="_blank"&gt;द्वितीय अध्याय, नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज&lt;/a&gt;) । और तो और, अगले महीने हो रहे उत्तरप्रदेश व अन्य राज्यों के चुनाव को देखते हुए कौन्ग्रेस की केन्द्र सरकार ने खास मुसलमानों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। इसमें 4.5% तक के आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें केन्द्र सरकार के सारे विभाग व सैकड़ों पीएसयू शामिल हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरक्षण का ज्ञान सबसे पहले मुझे 12वीं कक्षा पास करते समय हुआ, जब हम सब आईआईटी-जेईई में पास होने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे। जब परिणाम आया तो देखा कुछ तेज मित्र पिछे छूट गए और कुछ कमजोर मित्र आगे भी निकल गए। जब आईआईटी पहुँचे तो माहौल कुछ अगल ही था। लगभग एक चौथाई बच्चे ऐसे थे जो कम सँख्या पर भी अच्छे विभाग में थे, अर्थात् जो आरक्षण से आए थे। हालाँकि यह चर्चा का विषय था, पर बच्चों के बीच में रोष जैसा कुछ नहीं था। शायद यह रोष उनके बीच होता जिनको कोई भी सीट ना मिल पाई हो भारत के सबसे ईकाई के इस प्रौद्यौगिकी संस्थान में। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में आए-दिन आरक्षण को लेकर आन्दोलन होते हैं। कई वर्ग जी-तोड़ के आरक्षण के लिए हल्ला करते हैं, और कुछ  आरक्षण को हटाने के लिए बलिदान भी हो जाते हैं। अम्बेडकर जी के संविधान में आरक्षण का मुख्य कारण था शोषण। पर जैसे पिछड़े जाति वर्ग की राजनीति ने जोड़ पकड़ा, इसका राजनीतिकरण शुरू हुआ। इसका पहला शिलान्यास होता है &lt;a href="http://www.scribd.com/doc/19036160/Mandal-Commission" target="_blank"&gt;मंडल आयोग&lt;/a&gt; से। फिर फिर धीरे-धीरे इसमें गरीबी, धार्मिक अल्पसंख्य्कता, क्षेत्रियता जैसे मुद्दे भी जुड़ गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोषण बहुत बड़ा शब्द है और इसके कई अर्थ हो सकते हैं। एक शिक्षक किसी बच्चे को शोषित करता है जब वह उसको परिक्षा में कम सँख्या देता है क्योंकि वह उसका चहेता नहीं। एक पोलियोग्रसित शोषित होता है जब उसे इसलिए काम नहीं दिया जाता क्योंकि वह तेज चल-फिर नहीं सकता। एक लड़की शोषित होती है जब उसके माता-पिता उसे पढने विद्यालय इसलिए नहीं भेजते, क्योंकि उसे एक दिन पराई हो जाना है। इसी प्रकार अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण, धार्मिक बहुसँख्यकों द्वारा धार्मिक अल्पसँख्यकों का शोषण, पूर्वोत्तर राज्य के नागरिकों के खिलाफ क्षेत्रियता का पक्षपात और सबसे प्रचलित जो है जातीय शोषण : उच्च जाति का नीचली जाति पर शोषण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्बेड्कर जी आरक्षण के लिए किस तरह के शोषण की बात करते हैं? या फिर, अगर एक बार हम संविधान की अवज्ञा भी करें, तो किस तरह के शोषण के लिए हमारे संविधान में आरक्षण अनिवार्य होना चाहिए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामाजिक शोषण के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। पिछड़े वर्ग को ऊँचे वर्ग वाले हीन दृष्टि से देखते हैं, चाहे आर्थिक रूप से वह अधिक प्रबल हों। परन्तु इसमें अनूसूचित जाति-जनजाति वर्ग का स्थान कुछ अलग है। इन्हें सिर्फ नीची दृष्टि से देखा ही नहीं गया, बल्कि एक तरह से समाज निकाला ही कर दिया गया। इनके साथ उठना बैठना तो दूर, अन्य जाति वर्ग के क्षेत्र में इनका प्रवेश भी वर्जित था। हालाँकि समाज में ऊँच-नीच कई कारणों से बन ही जाती है, पर इस तरह का कटाव तो इस वर्ग के लिए आत्मघाति है, संविधान को जिसके रचयिता अम्बेडकर जी स्वयं पिछड़े वर्ग से थे, इनके लिए कुछ करना था। कुछ ऐसा जो घर-घर जाकर जात-पात को मिटाने संबंधी शिक्षा देने से बढकर हो, जो समाज सुधारकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, जिसे हम घूस देकर भी नहीं खरीद सकते और जो पूरे भारत देश में एक-समान लागू हो। अम्बेडकर जी देश को बिल्कुल झकझोर देना चाहते थे, और ना चाहते हुए भी उन्होंने आरक्षण का प्रावधान रखा, पर इसका स्वरूप अस्थायी रहने दिया। वह चाहते थे कि जब देशवासी पिछड़ी जातियों से मिलेंगे तो अपने-आप ही यह भेदभाव मिटने लगेगा और इस आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परन्तु इस धीरे-धीरे घटने वाले आरक्षण ने समय के साथ और मजबूती पकड़ ली। इसे एक आवश्यकता या मदद की बजाय एक फायदे के सौदे के रूप में देखा जाने लगा। इसका राजनीतिकरण हुआ और अन्य तरह के जातीय शोषण भी इसमें जुड़ने लगे। धार्मिक शोषण का हवाला देते हुए अल्पसँख्यक भी इसमे जुड़ गए। नतीजा हम सब के सामने है। कुछ साल पहले अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27% का आरक्षण पारित हुआ और अभी-अभी इसमें से 4.5% का आरक्षण धार्मिक अल्पसँख्यकों के लिए कर दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई गरीबी पर, कोई धर्म पर, कोई क्षेत्रियता पर, कोई भाषा पर तो कोई लिंगता पर भी आरक्षण मांग रहा है। &lt;b&gt;पर हम यह भूल रहे हैं कि इन सभी कारणों को हम मान भी लें, फिर भी यह हमें किसी संवैधानिक अधिकार से पूर्णतः वंचित नहीं करती, अंशतः भले ही करती हो।&lt;/b&gt; अर्थात् अगर कोई गरीबी के कारण पढ़ नहीं सकता तो पैसे कमाने के कई साधन हैं। किसी को भाषा की दिक्कत है तो वह भाषा सीख ले, या फिर ऐसा काम करे जिसमे भाषा की दिक्कत कम हो। किसी का धर्म किसी को पसंद नहीं तो वह अपने धर्मवासियों के बीच काम करे या कहीं और काम कर ले। अगर एक जगह नारी का शोषण होता है तो वह कहीं दूसरी जगह नौकरी ढूँढे जहाँ स्त्रियों का उचित सम्मान हो। और अगर कुछ भी बात ना बने तो न्याय का द्वार खटखटाए। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे देश में कोई भी वर्ग, चाहे वह क्षेत्र या जाति या धर्म या भाषा आदि के आधार पर बना हो, की इतनी बुरी स्थिति नहीं कि उसका उद्धार सामाजिक या अन्य सरकारी तरीकों से नहीं हो सकता। या फिर &lt;b&gt;उनका वर्ग इतना पिछड़ा और हनित है कि बहुत लघु या नाम के बराबर लोगों का ही उत्थान हो पाया हो या अधिकांश लोगों की संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा हो।&lt;/b&gt; हाँ, इसमें समय लग सकता है पर सुधार हो सकता है और हो रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरक्षण एक कड़वी दवा है, जो समाज में एक कठिन बीमारी को दूर करने के लिए हमें पिलाई गई है। हम सबकी भलाई इसी में है कि हम इस बिमारी को जल्द-से-जल्द दूर करें और इस कड़वाहट से मुक्ति पाएँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-3121143382970536573?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/3121143382970536573/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2012/01/blog-post_07.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/3121143382970536573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/3121143382970536573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2012/01/blog-post_07.html' title='अनूसूचित जाति-जनजाति हेतु आरक्षण'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>बिहार, भारत</georss:featurename><georss:point>25.9843778 85.9304546</georss:point><georss:box>24.1576498 83.40359910000001 27.8111058 88.4573101</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-4895096955713541858</id><published>2012-01-04T20:44:00.000+05:30</published><updated>2012-01-09T21:56:28.167+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुस्तक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महादलित'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><title type='text'>नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज और महादलित वर्ग</title><content type='html'>श्री नीतीश कुमार के चर्चे चारों तरफ हैं। क्यों न हो? बिहार और बिहारी के कायापलट में उनका प्रखण्ड योगदान रहा है। नए-नए तरीकों से उन्होंने राज्य को सुधारा और विकास की राह पर चलाया, कई मायनों में उन्हें देश का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री भी माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार का घटनाक्रम हमें आए-दिन समाचार से प्राप्त हो ही जाता है। पर नीतीश कुमार जैसे आकर्षक व्यक्तित्व, उनके नेतृत्व और विचारों का संकलन मिलना थोड़ा दुर्लभ है। जब मैंने उनके द्वारा या उनके ऊपर लिखी पुस्तकों को खोजा, तो मात्र दो पुस्तकें मिली। एक तो नई-नई आई है अरूण सिन्हा की लिखी हुई, &lt;a href="http://www.uread.com/book/nitish-kumar-rise-bihar-arun/9780670084593" target="_blank"&gt;नीतीश कुमार एंड राइज ऑफ बिहार&lt;/a&gt;, अंग्रेजी भाषा में है और थोड़ी लम्बी भी है, महंगी भी। 1975 की आपातकालीन घोषणा से लेकर अब तक की चर्चा है इस पुस्तक में, जैसे नीतीश कुमार की राजनीतिक लड़ाई, लालू यादव का ऊदय और पतन, और अंततः नीतीश कुमार की जीत, उनका प्रशासन तथा अन्य जुड़ी हुईं बातें। दूसरी पुस्तक जो एक मायने में स्वयं नीतीश कुमार ने ही लिखी है, &lt;a href="http://www.uread.com/book/viksit-bihar-ki-khoj-nitish/9788173159220" target="_blank"&gt;विकसित बिहार की खोज&lt;/a&gt;। इस पुस्तक को नरेन्द्र पाठक ने संपादित किया है, क्योंकि यह कोई आत्मकथा नहीं बल्कि बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार द्वारा दी गई 51 भाषणों का संग्रह है। इसकी भूमिका पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लिखी है। मन तो दोनों पुस्तक पर हाथ मारने का है पर पहले किसपर? मैंने शुरूआत की नीतीश जी के काम को जानने से, और खरीदी उन 51 भाषणों की पोथी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक शुरू ही होती है नीतीश कुमार जी के चहेते परियोजना और कई मायनों में एक राजनीतिक बदलाव से : महादलित। देश के मंडलीकरण के उपरान्त अग्रिम जातियों ने इसका फायदा तो उठाया, पर अल्पसंख्यक और बहुत पिछड़े जातियों पर इसका खास प्रभाव नहीं पड़ा। अनूसूचित जातियों-जनजातियों को 50 साल से आरक्षण मिलने पर भी उन्हें ज्यादा फायदा नहीं मिल पाया है। इस अंतर को नीतीश जी ने भांपा और इसपर अमल भी किया। कई आयोगों का गठन किया (जैसे &lt;a href="http://www.mahadalitmission.org/" target="_blank"&gt;महादलित आयोग&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://www.biharonline.gov.in/Site/Content/Government/dept/Dept.aspx?typ=&amp;amp;shr=PAR&amp;amp;id=51&amp;amp;AspxAutoDetectCookieSupport=1" target="_blank"&gt;कार्मिक व प्रशासनिक सुधार आयोग&lt;/a&gt;), नई नीतियों को चलाया जो खासकर इस महादलित वर्ग पर लागू होती हैं। इसमें रोटी, कपड़ा, मकान से लेकर सांस्कृतिक, आर्थिक व शैक्षिक विकास और स्वास्थ्य, सड़क जैसे विषयों को भी शामिल किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और कहीं मुझे लगा नीतीश जी एक साथ बहुत ज्यादा करने की सोच रहे हैं। जहाँ सरकार पर आर्थिक बंधन हो और महादलित समाज की स्थिति बहुत ही खराब हो, वहाँ एक पूर्ण विकसित हँसते-खेलते समाज की अपेक्षा 5-10 सालों में करना महत्वाकांक्षी है। तत्कालीन भरण-पोषण के लिए मवेशी अधिक फायदेमंद हैं, कार्यशैली सीखने और फिर कर्मचारी का काम करने से। साथ ही ऐसी शैलियाँ जिसकी शुरूआती लागत ना के बराबर हो, जैसे मिट्टी के बर्तन बनाना, बढ़ई, नाई इत्यादि, छोटे समय में अच्छे परिणाम दे सकते हैं। हालाँकि उत्पादन वाली शैलियों पर ज्यादा जोर देना होगा बनिस्पत सेवा शैलियों से।और हाँ, सिर्फ उत्पादन से ही नहीं, लोगों को जागरूक भी करना होगा ऐसे सामान को खरीदने के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों की शैक्षिक स्थिति नीतीश जी का और हम सब का सबसे बड़ा सरदर्द है। पहले बच्चे स्कूल में नाम लिखाते नहीं, फिर आते नहीं, फिर आते-आते कहीं रह जाते हैं, कुछ देर पढते हैं और फिर कहीं मजदूरी में लग जाते हैं। आखिर इस गति से शैक्षिक उद्धार होने से तो रहा। इस आने-जाने के चक्कर को छोड़ नीतीश जी को इसका एक ठोस हल निकालना चाहिए। और मुझे लगता है इसका हल है &lt;b&gt;आवासीय शिक्षा प्रणाली&lt;/b&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब खाने का, पढने का, कपड़े का, कॉपी का खर्चा उठा ही रहे हैं तो रहने का खर्चा तो एक बार का है। आवासीय शिक्षा के बहुत फायदे हैं, खासकर अत्यंत वंचित समाज के लिए। सबसे पहले इससे बच्चे चले जाते हैं कहीं दूर, बिल्कुल एक नए समाज में, जो अभी पनप रहा है, बाहरी प्रभावों से हट के, ऊँच-नीच से बेखबर, पारिवारिक व्यथा से अनजान। बचती है बस किल्कारी, क्रीड़ा और थोड़ी-मोड़ी पढाई। दूसरा है शिक्षा का प्रावधान। इसमें आप सिर्फ अ से आम और इ से इमली ही क्यों, सामाजिक शिक्षा दीजिए, खासकर पिछड़ी जातियों से संबंधित, उनके समाज के बारे में, उनके उत्थान/पतन के बारे में। साथ में जो कलाएँ और क्रीड़ा सीखाना है वो तो है ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.mahadalitmission.org/docs/media/news4.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.mahadalitmission.org/docs/media/news4.jpg" width="155" /&gt;&lt;/a&gt;और तीसरा और शायद सबसे मह्तवपूर्ण, बच्चों की ट्रेनिंग और अंतर्निहित उत्पादन। कला सीखना और इसी बहाने बेकार ही सही पर कुछ-कुछ बनाते जाना ही ऐसी संस्था को सक्षम बनाए रखने में मदद कर सकता है। सुबह से शाम तक बच्चों का सर पकाने से अच्छा है इन्हें कुछ मूल्यवान या मतलब की क्रिया में लगाना। यह मानना गलत नहीं होगा कि आवासीय विद्यालयों में बदमाशी की घटनाएँ जिम्मेदारियों के अभाव से भी बढ रही हैं। बस खेलने और पढने से सामर्थ और जवाबदेही नहीं आ जाती। छोटा ही सही पर ऐसा कार्य करें जिसका कोई मूल्य हो, आर्थिक नहीं तो सामाजिक ही सही, पर जिससे व्यक्तित्व का विकास तो हो। और साथ ही इसका आर्थिक स्वरूप भी बुरा नहीं है। कुछ उत्तरदायित्व वाला काम करेंगे तो उसका आर्थिक मूल्य भले ही रूपया में नही किसी सामान की आपूर्ति से भी हो जाए तो बहुत है। पुस्तक खरीदने की बजाय लिख ही डालें, कुछ खाने के सामान, खिलौने इत्यादि तो मनमुताबिक काम ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें इसके लिए अगर नए पाठ्यक्रम या डीग्री की आवाश्यकता पड़े तो इसपर भी काम कर सकते हैं। इन्हें हर तरह के कलाओं से अवगत कराएँ और सीखाएँ। मिट्टी से बर्तन या खिलौने बनाना, खेत में हल जोतना या बीज बोना, फूलों की देखभाल करना, ईंट-पत्थर से घर बनाना, लकड़ी से तख्ता, कुर्सी या टेबल बनाना, पत्थरों पर शिल्पकला, कबीलों या गाँव की खास कलाएँ जो वहाँ अधिक प्रचलित हों, लोहार के काम, साधारण बिजली और इलेक्टॉनिक सामान का कार्य और कई ऐसी कलाएँ जो हमारे जीवन में उपयोगी हैं और उनका अध्ययन कम लागत पर आसान तरीकों से किया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में, अगर संभव हो सके तो इसमें लड़के और लड़कियों को एक ही विद्यालय में साथ-साथ पढाएँ ना कि अलग-अलग। ना सिर्फ इससे लड़कियों में पढने और आगे बढने की स्पर्धा होगी, बल्कि बालाओं के साथ आए-दिन हो रही घटनाओं पर भी ताला लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-4895096955713541858?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/4895096955713541858/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/4895096955713541858'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/4895096955713541858'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज और महादलित वर्ग'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>बिहार, भारत</georss:featurename><georss:point>25.9843778 85.9304546</georss:point><georss:box>24.1576498 83.40359910000001 27.8111058 88.4573101</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-871411583557147125</id><published>2011-06-10T11:14:00.004+05:30</published><updated>2012-01-03T16:24:45.597+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशिक्षण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाहनचालन'/><title type='text'>वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन ५ (अंतिम)</title><content type='html'>इतना सीखने के बाद अभ्यास से कार चलाना आ सकता है। कुछ विशेष बातें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रिवर्स गियर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रिवर्स गियर लगायें। स्टीयरिंग सीधी और उसके ऊपर वाले हिस्से को कस के पकड़ लें। सीट बेल्ट निकालें, बगल वाली सीट के ऊपर हाथ रखें और बिल्कुल पीछे देखें। अगर दायें जाना हो तो दायीं तरफ स्टीयरिंग घुमायें और बायें जाना हो तो बाईं तरफ। स्टीयरिंग बहुत थोड़ी देर के लिए घुमायें और तुरन्त सीधी कर लें। पार्किंग करने के लिए रिवर्स गियर का ही उपयोग उचित माना गया है (कोणिक या ऐन्गुलर पार्किंग को छोड़कर) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मल्टीलेवल पार्किंग लॉट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आजकल मॉल में मल्टीलेवल पार्किंग होती है। अगर ऊपर जा रहे हों और आगे और पीछे दोनो कार हों तो कार को कंट्रोल करना जरूरी है अन्यथा दूसरों की कार को धक्का लग सकता है। हैंडब्रेक लगाएँ, कल्च नीचे और गियर 1 पर एक्सेलेरेटर इतनी दबाएँ की हल्की जोर से आवाज हो। क्लच को बाइटिंग पोइंट पर लाएँ, इससे कार की वाइपर वाली सतह ऊपर उठती है। फिर हैंडब्रेक छोड़ें, और धीरे धीरे क्लच को छोड़ें और एक्सेलेरेटर बढाएँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;समांतर या पैरलल पार्किंग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कार दिवार की दिशा में खड़ी है। रिवर्स पार्किंग करनी होगी। कार आगे वाली कार के बराबर में लें, उसके लिए आइना या मिरर को मिला लें। अगर कार दूसरी दिशा में खड़ी हो तो मीड-डोर या कार के दरवाजों का मध्य हिस्सा मिलाएँ। दोनों कार के बीच में 2 फिट से ज्यादा की दूरी ना रखें। पार्किंग की दिशा में स्टीयरिंग फुल-लॉक करें और तब तक पीछे लें जब-तक कार की मिरर खड़ी कार के अंतिम हिस्से (या टेल लैम्प या हेड लैम्प) पर आ मिले। फिर स्टियरिंग को दूसरी दिशा में फूल-लॉक करें और तब-तक पीछे जाएँ कि कार दीवार से सीधी हो जाए। स्टीयरिंग को सीधी करें और पिछे जाएँ और फिर आगे, ताकि कार ठीक से पार्क हो जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अभिलम्बित या वर्टीकल या परपेन्डिकुलर पार्किंग। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कार दीवार के ऊपर सीधी खड़ी है (अभिलम्बित)। कार के पिछले हिस्से को खड़ी कार के अगले हिस्से से मिलाएँ, जैसे बाएँ टेल लैम्प को उसके बाएँ हेड लैम्प से (चित्र देखें)। स्टीयरिंग को पार्किंग की दिशा में फुल-लॉक करें और तब तक पीछे लें जब तक कार सीधी नहीं हो जाति, या दीवार के अभिलम्बित। फिर कार को थोड़ा आगे पीछे लें और अच्छे से पार्क करें।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कोणिक या ऐन्गुलर पार्किंग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह साधारणतः वन-वे या एकदिशा में जाने वाली सड़क पर होती है। कार के मीड-डोर को खड़ी कार के आगे वाले टेल-लैम्प से मिलाएँ और स्टीयरिंग को बाएँ मोड़ें ताकि कार पार्किंग लाइन में आ जाए। स्टीयरिंग सीधी करें और ठीक से पार्क करें। अगर रिवर्स पार्किंग करना हो तो अभिलम्बित या वर्टीकल पार्किंग जैसे ही पार्क कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-XyKL22QkdUI/Tp6qfOM3DzI/AAAAAAAAC_A/fXWRkU9Q5oA/s1600/19102011954.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-XyKL22QkdUI/Tp6qfOM3DzI/AAAAAAAAC_A/fXWRkU9Q5oA/s320/19102011954.jpg" width="202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;टायर बदलना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उपयोगी लिंक : &lt;a href="http://www.team-bhp.com/forum/technical-stuff/98472-pictorial-guide-how-change-flat-tyre.html"&gt;सचित्रिक वर्णन : कार के पंचर पहिये को कैसे बदलें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;टायर बदलना थोड़ी शारीरिक है पर उपयोगी है। सबसे पहले वील-स्पैनर से पहिये की नट हल्की ढीली करें, जरूरत पड़े तो स्पैनर पर खड़े भी हो सकते हैं। हमेशा आमने-सामने वाले नट को पहले ढीली करें ना कि बगल वाले को। पिछले पहिये के ठीक सामने और अगले पहिये के ठीक पिछे कार के नीचे एक लोहे की लाइन है (दरवाजे के निचले हिस्से के पिछे) जिसमे जैक फीट हो सकता है। पहिये से सटकर बैठ जाएँ, जैक में जैक हैन्डल लगाकर और उसमें वील-स्पैनर लगाकर घुमाएँ और उसे ऊपर करें। जब पहिया 3-4 अंगुली ऊपर हो जाए तो रूक जाएँ, सारे नट ढीला करें और पहिया बाहर निकाल लें। अच्छा पहिया लगाएँ और उसे जितना हो सके टाइट कर लें। फिर जैक को नीचे करें और बाहर ले लें। ध्यान रहे कि नट हमेशा आमने-सामने खोलना है। नट ज्यादा टाइट भी नहीं करना है उससे वह घीस सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;क्लच, गीयर, ब्रेक और एक्सेलेरेटर&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;अगर रूक-रूक के कार चलानी हो तो गियर 1, अन्यथा अगर धीमी-तेज कार चलानी हो तो गियर 2 से नीचे ना आएँ। पाँव की एड़ी पूरी तरह जमीन पे गड़ाएँ रखें (खासकर कल्च) और लीवर की तरह क्लच, ब्रेक और एक्सेलेरेटर को दबाएँ और छोड़ें। इससे बाइटिंग पोइंट पर आना, क्लच और ब्रेक तथा क्लच और एक्सेलेरेटर का तालमेल अच्छा रहता है। धीमी कार हो तो क्लच अचानक छोड़ने से कार में धक्का सा लगता है, इसलिए धीरे धीरे क्लच छोड़े और साथ में एक्सेलेरेटर भी दें। इससे कार स्मूद जाएगी। अगर तेज हो तो क्लच को पूरी तरह छोड़ सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग 500किमी कार चलाने के बाद कुछ मुझे अपनी चालन विधि में कुछ खोट लगी और मैं पुनः अपने संदेह दूर करने वाहन चालन विद्यालय गया। कार शुरू करने का सबसे साधारण तरीका : थोड़ा एक्सेलेरेटर दबाकर क्लच को बाइटिंग बिन्दू (क्लच को धीरे-धीरे छोड़ने पर कार हल्की कम्पन करती है, वह बिन्दू) पर लाएँ जिससे कार आगे बढे। अगर सतह समतल ना हो ब्रेक का उपयोग करें : क्लच को बाइटिंग बिन्दू पर लाकर ब्रेक छोड़ें और एक्सेलेरेटर का प्रयोग करें। अगर कार के सामने बाधा नहीं है तो गीयर एक से जल्दी ही गीयर 2 पर आ जाएँ। गीयर 1 और 2 में क्लच और एक्सेलेरेटर के बीच साइकिल के पैडल का हिसाब जैसा है : क्लच ऊपर जाता है तो एक्सेलेरेटर नीचे। गीयर 3 से 5 तक क्लच को तुरन्त ही छोड़ देने में कोई दिक्कत नहीं है, हाँ कार की उतनी स्पीड(20-30) बनी रहनी चाहिए। अगर क्लच का उपयोग नहीं कर रहे हों तो पैर क्लच से हटाकर नीचे रख दें। किसी जाम में फँसने पर कार रूक-रूक कर चलती है। अतः ब्रेक, बाइटिंग बिन्दू और एक्सेलेरेटर तीनों का उपयोग होता रहता है। ब्रेक दबाते समय क्लच पूरी तरह नीचे होना चाहिए, वरना क्लच खराब हो सकती है। गीयर 1 और गीयर 2 तक क्लच और एक्सेलेरेटर साथ-साथ चल सकते हैं पर गीयर 3 और ऊपर नहीं। गीयर जल्दी बदलें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-871411583557147125?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/871411583557147125/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_10.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/871411583557147125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/871411583557147125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_10.html' title='वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन ५ (अंतिम)'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-XyKL22QkdUI/Tp6qfOM3DzI/AAAAAAAAC_A/fXWRkU9Q5oA/s72-c/19102011954.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>बंगलुरु, कर्नाटक, भारत</georss:featurename><georss:point>12.9715987 77.5945627</georss:point><georss:box>12.724026199999999 77.2787057 13.2191712 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दोनो दिशाओं में अभ्यास करें। हमेशा टर्निंग पोईंट के पास से शार्प टर्न लें, अन्यथा गलती हो सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;गियर 3 और 4&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सीधे मुख्य सड़क पर जाकर सबसे पहले हमने 20 की गति पर गीयर 2 लगाया। फिर कार तेज की और 30 की गति पर गियर 3। थोड़ी और तेज की और 40 की गति पर गियर 4। जल्दी ही बम्पर आ गया और सीधे 4 से 2 गियर पर आ गये। स्टीयरिंग सीधी और कार को तेज अथवा धीमी करने की आदत पड़ जाने से वाहनचालन आसान है। जब भी कार तेज ना करनी हो तो ब्रेक पर पैर बना कर रखें, क्या पता कब जरूरत पड़े। कार तेज तभी करें जब सड़क पर आगे जाना आसान हो। हल्के ब्रेक के लिए क्लच दबाना जरूरी नहीं, पर तेज ब्रेक के लिए क्लच ना दबाने से कार बंद हो जाती है। आज हमारे साथ एक दो बार ऐसा हुआ पर गियर 1 पर जब कार रूकी या बहुत धीमी थी। U टर्न लेकर कार तुरन्त सीधी करना बहुत आवश्यक है, इसका अभ्यास करें। गियर तुरन्त बदलें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरक्षा के ध्यान से हॉर्न बजाते रहें। बच्चे या महिलाएँ सड़क पर हों तो सावधानी से जाएँ, धीरे जाएँ। सड़क टूटी-फूटी हो तो गियर 1 पर धीरे धीरे कार को निकाल लें। स्टीयरिंग पर मजबूत पकड़ जरूरी है, अन्यथा दिशा अनचाहे बदल सकती है। अगर अच्छी सड़क हो तो गियर 2 से नीचे जाने की जरूरत नहीं, इसपर बम्पर भी निकाल सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही अंतराल पर कार को रोककर आराम करें, और फिर आगे बढें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-2356512433563778496?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/2356512433563778496/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_643.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/2356512433563778496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/2356512433563778496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_643.html' title='वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन ४'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>बंगलुरु, कर्नाटक, भारत</georss:featurename><georss:point>12.9715987 77.5945627</georss:point><georss:box>12.724026199999999 77.2787057 13.2191712 77.91041969999999</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-20803832826759895</id><published>2011-06-06T10:38:00.003+05:30</published><updated>2012-01-03T16:24:29.197+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशिक्षण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाहनचालन'/><title type='text'>वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन ३</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कार प्रशिक्षण : गियर चेंज, हाफ क्लच&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आज भी एक घंटे की ही ट्रेनिंग हुई। कार मैंने ही स्टार्ट की। सीट को सेट किया, क्लच नीचे और कार स्टार्ट। हल्का सा ब्रेक , गियर 1 और हैंडब्रेक डाउन। हाफ क्लच और धीरे से ब्रेक रीलीज़ करने से कार आगे निकली। राइट लॉक लगाकर कार को अबाउट टर्न लिया और आगे बढे। बम्प पर क्लच नीचे, ब्रेक से धीमे हुए, और बम्प से ठीक पहले ब्रेक को छोड़ दिया, पर क्लच नीचे ही है। बम्प निकल जाने के बाद हाफ कल्च पर आकर एक्सेलेरेटर। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;टर्न&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लेफ्ट टर्न शार्प लेना चाहिए और राइट टर्न लॉंग। इंडीकेटर का उपयोग करें। धीरे टर्न लें।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;लेन व कार की चौड़ाई का आकलन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;स्टीयरिंग बस हल्का सा दाएँ बाएँ करने से सड़क पर कार की दिशा बनी रहती है। ज्यादा स्टीयरिंग टर्न के समय लेना चाहिए जब गति धीमी हो। कार की चौड़ाई भाँपने के लिए वाइपर के अंदर से तीरछा देखें तो सड़क का किनारा दिखना चाहिए। गड्ढे से ज्यादा परहेज की जरूरत नहीं, हाँ धीमे हो सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;गियर चेंज&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कार 1 गीयर पे शुरू होनी चाहिए। क्लच को बाइटिंग पोइंट पर रखें और ब्रेक को धीरे से छोड़ें। फिर एक्सेलेरेटर से स्पीड 20 तक ले जाएँ, क्लच दबाएँ, गीयर 2 पर करें, क्लच छोड़ें और छोड़ते के साथ ही एक्सेलेरेटर दबाते रहें स्पीड बढाने के लिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-20803832826759895?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/20803832826759895/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_06.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/20803832826759895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/20803832826759895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_06.html' title='वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन ३'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>बंगलुरु, कर्नाटक, भारत</georss:featurename><georss:point>12.9715987 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चिन्ह गोल होते हैं : जैसे नो पार्किंग, नो ओवरटेकिंग, नो लेन चेंज, स्पीड लिमिट, रंग लाल और काला होता है, अगर नहीं माने तो जुर्माना देना पड़ सकता है। चेतावनी वाले चिन्ह त्रिकोण आकार के होते हैं : जैसे बम्प अहेड, रंग सफेद-लाल या पीला होता है, यह हमारी सुरक्षा की दृष्टि से उपयोगी है। सूचना वाले चिन्ह चौखुट होते हैं : जैसे अस्पताल, पेट्रोल पम्प, रंग नीला होता है, यह हमारी सुविधा के लिए लगाए जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सड़क के नियम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सड़क पर लेन व ट्रैफिक रेगुलेशन के लिए धारियाँ बनी होती हैं। अगर टूटी-टूटी सफेद/पीली लाइन हो तो लेन चेंज/ओवरटेकिंग कर सकते हैं, पर सीधी धारा में नहीं। टर्न लम्बी लेनी चाहिए और कम स्पीड पर लेनी चाहिए, इससे रोलिंग डीप (सेन्ट्रीफ्यूगल फोर्स के कारण) कम रहता है और कार स्कीड या उलटती नहीं। न्यूट्रल गीयर पर कार ना चलाएँ, इससे कंट्रोल कम रहता है। अगर कार तेज हो और टर्न लेने से स्कीड करे, तो स्टीयरिंग सीधी और ब्रेक लगाने से कार को नियंत्रण में लाएँ और फिर टर्न लें। ऊपर जाने वाली गाड़ी को गीव-वे (पास) दें। &lt;br /&gt;पार्किंग रिवर्स में करनी चाहिए। पहले बाईं स्टीयरिंग से कार अंदर लें और जब कार का अगला पहिया लगी हुई कार के पिछले पहिए से मिल जाए, स्टीयरिंग दाईं करें और कार सीधी करें। पार्किंग में 4 फिट आगे पिछे की दूरी रखें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कार ट्रेनिंग &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बारिश होने के कारण सबकुठ उल्टा-पुल्टा हो गया। दो घंटे की बजाय एक घंटे की ट्रेनिंग हुई। सबसे पहले कार का निरीक्षण। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कार के बाहर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कार के नीचे कुत्ते, पीछे छोटे बच्चे, पहिये के नीचे पत्थर को देख लें या फिर कहीं तेल लीक ना हुई हो। विंड शिल्ड और पीछे का शीशा, साथ में दाएँ-बाएँ का मिरर साफ होनी चाहिए। टायर पर मुक्का मारने से अगर बाउन्स करे तो हवा का प्रेशर ठीक है। पहिये के नट-बोल्ट लगे हों। टायर घीसी ना हो। डीक्की में एक पहिया और पहिया खोलने वाला रॉड हो।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बोनेट के अंदर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ईंजन तेल का लेवल ना बहुत ज्यादा ना बहुत कम होना चाहिए। ब्रेक का तेल फुल रहना चाहिए। वाइपर में पानी भरा होना चाहिए। फैन बेल्ट टाइट होनी चाहिए। बैटरी में डीस्टील्ड वाटर फुल होना चाहिए, और बराबर मात्रा में। बैटरी की तार टाइट होनी चाहिए। अगर लम्बे समय के लिए कार नहीं चलानी तो बैटरी का तार खोल दें। वापस आने पर बैटरी को चार्ज करें और एक घंटे ईंजन ऑन करके बस रहने दें।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कार के अंदर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले सीट पर बैठें। स्टीयरिंग को पकड़ कर नीचे हैन्डल से सीट आगे-पीछे करें जिससे पैर L आकार में होनी चाहिए। दाएँ-बाएँ मिरर को ऐसे सेट करें की 20% कार और बाकी सड़क दिखे। रियर मिरर में सिर्फ पीछे की सड़क दीखनी चाहिए। अगर सीधे जा रहे हों तो बस रियर मिरर देखें। अगर टर्न लेना हो तो दाएँ बाएँ देखें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कार चलाना : शुरू और बंद करना।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हमने कार को मैदान में चलाया। ईंजन चाभी से शुरू करने से पहले क्लच नीचे, हैंडब्रेक ऊपर और गीयर न्यूट्रल में होना चाहिए। ईंजन शुरू करने के बाद गीयर 1 पर और हैंडब्रेक नीचे करें। क्लच को लगभग आधा छोड़ने से कार आगे जाती है। अगर कार को रोकना हो तो क्लच को नीचे करें और ब्रेक धीरे से दबाएँ। कार को तेज करनी हो तो हल्का एक्सेलेरेटर दबाएँ। स्टीयरिंग में लेफ्ट लॉक से दो बार दाएँ घुमा कर व राइट लॉक से दो बार बाएँ घुमाने से वह सीधी हो जाती है। लेफ्ट लॉक का मतलब है स्टीयरिंग पूरी तहर बाएँ घुमा देना। कार को बार-बार शुरू व रोकने की प्रैक्टिस करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;कल दो घंटे की क्लास और सम्भवतः दो घंटे की ट्रेनिंग है।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-8788378923110366990?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/8788378923110366990/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_04.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/8788378923110366990'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/8788378923110366990'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post_04.html' title='वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन २'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>बंगलुरु, कर्नाटक, भारत</georss:featurename><georss:point>12.9715987 77.5945627</georss:point><georss:box>12.724026199999999 77.2787057 13.2191712 77.91041969999999</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-8473319360122800987</id><published>2011-06-03T22:03:00.010+05:30</published><updated>2012-01-03T16:24:08.473+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशिक्षण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाहनचालन'/><title type='text'>वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन १</title><content type='html'>कल ख्याल आया कि कारचालन का प्रशिक्षण लिया जाए। बहुत ढूँढा पर घर के आस-पास कोई जमा नहीं। एक ने 2000 में बात की, 9 घंटे सिखाने के लिए और एक ने 2300 माँगा। एक अच्छी स्कूल मिली "मिनी ड्राइविंग स्कूल", यहाँ 10घंटे के लिए 2500 लगते, और यह सरकारी पंजीकृत भी है। यहाँ मैं जाने ही वाला था पर मैंने इन्टर्नेट पर &lt;a href="http://www.marutidrivingschool.com/learners.html"&gt;मारूति ड्राइविंग स्कूल&lt;/a&gt; की अच्छी रिव्यू पढी। साइट पर देखा तो समझ आया कि दाम भले ही ज्यादा हो, सीखने की सही जगह यही है। आखिर सिर्फ कार ही नहीं चलाना, उसकी जानकारी और सड़क के नियमों की जानकारी भी जरूरी और लाभदायक है। सात घंटे क्लासरूम, 3 घंटे सिमुलेशन और 10 घंटे प्रैक्टिकल के लिए 4500 से 5500 तक खर्च आ सकता है। स्विफ्ट के लिए 5250 का खर्च पड़ेगा।वैसे तो कुल प्रशिक्षण 20 घंटे का है, पर यह अगले सप्ताह तक समाप्त कर हो जाएगा। साधारणतया इसमें 20 दिन लगते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कार का डेमो&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुझ जैसे लोगों के लिए जिनको कार का क भी नहीं पता, यह लाभदायक था। कार में तीन तरह के कंट्रोल होते हैं : 1) स्टीयरिंग 2) क्लच, ब्रेक और एक्सेलेरेटर 3) गीयर और हैंडब्रेक। स्टीयरिंग से कार दाएँ या बाएँ जा सकती है। इसे घुमाते समय हाथ क्रौस नहीं करना चाहिए। स्टीयरिंग का ऊपरी हिस्सा पकड़ें। स्टीयरिंग पकड़ते समय हाथ मुँड़े होने चाहिए। बाएँ जाने के लिए बाएँ हाथ ऊपर से नीचे करे और फिर दाएँ हाथ से ऊपर करें। उसी तरह दाएँ जाने के लिए दाएँ हाथ को ऊपर से नीचे और फिर बाएँ को नीचे से ऊपर करें। इसपर ही हॉर्न भी होता है। इसके नीचे दाईं तरफ एक हैंडल से हेडलाइट सिग्नल दे सकते हैं अगर ओवरटेक करना हो तो। हेडलाइट धीमी या तेज कर सकते हैं। पार्किग लाइट को पार्क करते समय उपयोग में लाएँ। स्टीयरिंग के बाएँ या दाएँ घुमाने से अपने आप दायाँ और बायाँ वाला इंडिकेटर जल उठता है। &lt;br /&gt;क्लच पूरी तरह दबाकर कार शुरू करें। क्लच हलका छोड़ने से कार थोड़ी आगे जाती है। क्लच और एक्सेलेरेटर साथ साथ ना दबाएँ इससे ईंजन खराब हो सकती है। क्लच को एकदम से भी ना छोड़े वरना कार अचानक से रूक जाएगी। क्लच छोड़ते छोड़ते एक्सेलेरेटर को दबाना शुरू करें। ब्रेक दबाने के लिए क्लच पूरी तरह दबा कर रखें। और हाँ, क्लच पर पूरा पैर रखें पर ब्रेक या एक्सेलेरेटर पर सिर्फ हल्का सा। बायाँ पैर सिर्फ क्लच पर और दायाँ पैर ब्रेक या एक्सेलेरेटर पर रख सकते हैं। ब्रेक दबाने से चारों पहियों पर ब्रेक लगता है। ऐसे बैठें कि पैर मुँड़े हों क्लच या ब्रेक लगाते समय। सीट को ऐसे ही फिट करें।&lt;br /&gt;गीयर 1 से 5 तक होती हैं, 1 से 10, 2 से 20, 3 से 40 और इसी तरह गीयर बढाने से स्पीड बढती है। हैंडब्रेक से कार के पिछले पहिए पर ब्रेक लगती है। &lt;br /&gt;कार में कई तरह के मीटर लगे होते हैं। कार की स्पीड के लिए, ईंधन के लिए, ईंजन के लिए, ईंधन की कमी, गियर चेंज, सीट बेल्ट चेतावनी, रिवर्स गियर, डोर लॉक इत्यादि।&lt;br /&gt;विंड शील्ड गंदा होने से उसे साफ किया जा सकता है। वाइपर को बिना पानी के चलाने से शीशे पर दाग पड़ सकता है। वाइपर एक बार, दो बार, या फिर तेज बारिश में बार-बार चालू कर सकते हैं। ड्राइवर सीट के दरवाजे पर पावर विंड़ोज बटन होते हैं, उससे शीशे एक बार में ऊपर नीचे हो सकते हैं। अगर लॉक कर दिया जाए तो सिर्फ ड्राइवर का शीशा खुल सकता है। डोर लॉक से सारे दरवाजे बंद और खोले जा सकते हैं। बटन से दाएँ और बाएँ मिरर को आगे पीछे किया जा सकता है। 20% कार और बाकी पीछे की सड़क दीखनी चाहिए। रियर मिरर में कार का पूरा पिछला भाग दिखना चाहिए। एसी के तीन कंट्रोल होते हैं। एक से पंखा तेज होता है, एक से तापमान जो कार को गरम रखने में भी काम आता है। एसी के वाल्व कार में कई जगह फिट होते हैं उन्हें सुविधा अनुसार शुरू-बंद कर सकते हैं। ठंड के समय विंड शिल्ड की एसी शुरू करने से अंदर कुहासे से पानी नहीं जमता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ड्राइविंग सिमुलेशन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कार चलाने से पहले एक मॉडल पर बैठकर प्रैक्टिस कर सकते हैं। इसमें स्टीयरिंग, क्लच, ब्रेक, एक्सेलेरेटर, गियर और हैंडब्रेक होती है। सामने स्क्रीन पर रिपोर्ट या सिमुलेशन देख सकते हैं। पहले कार को शुरू करना, फिर बंद करना, गियर बदलना और अंत में स्टीयरिंग घुमाना। &lt;br /&gt;कार को शुरू करने से पहले गियर न्यूट्रल, हैंडब्रेक अप, क्लच पूरी तरह से दबी होनी चाहिए। चाभी से शुरू करके गियर 1 पर लगाएँ। क्लच को हल्का छोड़ें और एकसेलेरेटर को दबाएँ। थोड़ी देर में हैंडब्रेक नीचे करें। क्लच को धीरे धीरे छोड़ें और एक्सेलेरेटर से स्पीड बढाएँ।&lt;br /&gt;कार को रोकने के लिए एक्सेलेरेटर को पूरी तरह छोड़ दें और कल्च पूरी तरह दबाएँ। फिर ब्रेक दबाएँ जबतक कार पूरी तरह से रुक नहीं जाती। हैंडब्रेक लगाएँ और गियर को न्यूट्रल पर करें। कार को चाभी से बंद करें। &lt;br /&gt;गियर चेंज करने से पहले एक्सेलेरेटर से कार की स्पीड इतनी बढा लें की अगला गिअर लगा सकें। एक्सेलेरेटर पूरी तरह से छोड़ें और गिअर पूरी तरह से दबाएँ। गिअर एक से दो पर करें। धीरे धीरे क्लच छोड़ें और एक्सेलेरेटर से और स्पीड बढाएँ। यह पूरी क्रिया तेज करनी होगी वरना स्पीड धीमी हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;अगले दिन क्लासरूम है दो घंटे की और कार के साथ दो घंटे की प्रैक्टिकल। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-8473319360122800987?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/8473319360122800987/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/8473319360122800987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/8473319360122800987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='वाहन चालन प्रशिक्षण - दिन १'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total><georss:featurename>बंगलुरु, कर्नाटक, भारत</georss:featurename><georss:point>12.9715987 77.5945627</georss:point><georss:box>12.724026199999999 77.2787057 13.2191712 77.91041969999999</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-5643734072319734979</id><published>2011-05-17T16:26:00.003+05:30</published><updated>2012-01-03T16:28:00.459+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंगा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदूषण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कारखाना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पूजा-पाठ'/><title type='text'>गंगा और इसकी पवित्रता</title><content type='html'>भारतियों के लेए गंगा नदी का महत्व ही कुछ और है। इसकी जल, घाट, घाटी, उत्पत्ति सभी प्रिय हैं। परन्तु आजकल लोगों मे बड़ा रोष है गंगा घाटों को लेकर; खासकर जो गगा घाटी में नहीं रहते और गंगा-स्नान की अभिलाषा में दूर-दराज़ से आते हैं। घाट पर पूजा-पाठ, क्रियाक्रम तथा लोगों की बहुमता से हुई गंदी घाट से अब इनका मन भरने लगा है। कुछ लोग तो बिना डुबकी लगाए जल छूकर निकल लेते हैं। और मैं सोचता हूँ कि क्या गंगा फूल-पत्तों, मुंडन हुए बालों और लोगों के डुबकी लगाने से गंदी हो सकती है? क्या शमशान घाट में अस्थियाँ बहाने से गंगा प्रदूषित हो सकती है? परन्तु यही तो गंगा हमारी गंगा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूजा-पाठ के फूल पत्तों या शमशान घाट के अस्थियों से गंगा नदी प्रदूषित नहीं होती, ना हि होती है हमारे डुबकी लगाने या मुंडन कराने से। यही तो गंगा नदी का स्वरूप है। और ये क्रियाएँ हम सदियों से करते आए हैं। गंगा पहले तो शुद्ध ही थी इसमें कोई दोराय नहीं। फिर यहीं क्रियाएँ आज प्रदूषण कारण बनें, यह यथार्थ नहीं जान पड़ता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगा नदीं के प्रदूषण का मुख्य कारण कारखानों के अप्राकृतिक मलवे हैं तो जल और मिट्टी को जहरीला बनाते हैं। जल के बहाव की कमी का कारण बाँध, नहरें इत्यादि हैं जिसके कारण नदी के स्वतः सफाई का कार्य भी धीमा हो जाता है। सबसे घिनौनी बात तो यह है कि बड़े शहरों (कानपुर, पटना इत्यादि) की सारी गंदगियाँ (मल मूत्र से लेकर कचरा इत्यादि) भी निगम वाले इस पवित्र नदी में डालते हैं। ये सारी चीजें ही नदीं के असली स्वरूप को जो कि स्वच्छ है, खराब करती हैं। हालाँकि जनसँख्या बढ जाने के कारण घाटों पर भीड़ भी बढ गई है और इससे घाट की क्रियाएँ भी ज्यादा हो गई हैं। परन्तु हमारी गंगा में इतना सामर्थ्य है कि इन सब पापों का भोज ढो लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुझाव : &lt;br /&gt;(१) कारखानों के लिए जल का मुख्य स्त्रोत नदियाँ हैं। पर उनके मलवे का मुख्य नाला भी यही नदी बन जाए तो गड़बड़ है। इनके लिए मलवे-विस्तरण की अच्छी सुविधाएँ दी जाएँ और इन्हें सख्ती से लागू किया जाए।&lt;br /&gt;(२) हमें शहरों की गंदगियों की ठोस व्यवस्था करनी होगी। शहर भी प्रायः नदियों के आसपास पाए जाते हैं और नदी को सबसे ज्यादा गंदा करते हैं। (पटना तो कुछ भी नहीं, कानपुर और बनारस की हालत तो बहुत खराब है) । &lt;br /&gt;(३) गंगा घाट पर प्रायः क्रियाओं के लिए पक्की सुव्यस्था की जाए। इससे घाट की दैनिक सफाई आसान रहेगी। बड़े घाटों पर कर्मचारियों की नियुक्ति भी की जा सकती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-5643734072319734979?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/5643734072319734979/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/5643734072319734979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/5643734072319734979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='गंगा और इसकी पवित्रता'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>मुंगेर, बिहार, भारत</georss:featurename><georss:point>25.37262 86.490321</georss:point><georss:box>25.343926 86.45083899999999 25.401314000000003 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अपनी भलाई समझते हैं। चूँकि मैं बहुत जिद्दी हूँ और मेरी आदतें मन-मुताबिक हैं, मैंने शायद ही दादाजी की हामी में तुरन्त हामी भरी होगी। पर मैं यह दावा नहीं करता कि इस टकराव में जीत सिर्फ मेरी हुई है। दादाजी ने कम नहीं तो बराबरी में मुझे जरूर पटखानी दी होगी। खैर, हमारी यह तकरार तो रोज चलती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा मैंने पहले भी कहा, दादाजी की तबियत बहुत दुरूस्त है। और इसका श्रेय शत्-प्रतिशत् दादाजी को ही जाता है। तन्द्रुस्त शरीर, पौष्टिक भोजन, योगा और कसरत, चिंतन और ध्यान दादाजी के मन और तन को ताजा बनाए रखता है। इसलिए दादाजी बीमार कम ही पड़ते हैं, पर अगर पड़ें तो मेरी चिंता की घंटी बजने लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक हफ्ते से दादाजी की तबियत खराब है। पिछले शनिवार चेन्नई जाने से पहले दादाजी की कमर में दर्द शुरू हुआ था। हालाँकि दर्द बर्दाश्त के लायक था, फिर भी दादाजी के कमर की हालत नाजुक होने के कारण मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था। पापाजी से कुछ दवाई और कसरत का सुझाव लेकर मैंने दादाजी को समझाया, और जल्द ही ठीक होने का आश्वासन देकर मैं चेन्नई के लिए निकल पड़ा। सोमवार को जब मैं लौटा तो उनकी हालत में काफी सुधार था, जबकि मेरी हालत में हल्की गड़बड़ियाँ दिखने लगी थीं( खैर यह तो हर सफर के बाद मेरे साथ होता है)। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मम्मी और पापा ने दीदी के हाथों ढेर सारा सामान भिजवाया था। चेन्नई में मैं जब दीदी से मिला तो मुझे एक बैग भड़ा सामान उसने थमा दिया। आम, लीची, गुरम्मा (टिकोला/कच्चा आम की चटनी) और मिठाई से भरा बैग मैं खुशी-खुशी घर लेकर आ गया। आम थोड़े कच्चे थे पर लीची तो बहुत मीठे थे। मन भर मैंने और दादाजी ने लीची का आनन्द लिया और मन ही मन पापाजी को धन्यवाद भी किया। आखिर यहाँ ऐसे स्वादिष्ट फल कहाँ मिलते हैं! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे धीरे सब-कुछ ठीक हो रहा था पर शायद नहीं भी। कमर दर्द ठीक होने के बाद बृहस्पत को दादाजी की पेट खराब हो गई। शरीर में खिंचाव और दर्द होने लगा। हल्की तेल-मालिश के बाद दादाजी को थोड़ा चैन मिला। चूँकि दादाजी ने मुझे एक दिन बाद इसके बारे में बताया, दवाई तो अगले दिन ही देनी पड़ी। फिर धीरे-धीरे तबियत में मजबूती आई ही थी कि फिर से खराब हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी दादाजी की तबियत नियंत्रण में है और मेरी भी। हालाँकि खाने-पीने का हिसाब बिल्कुल बिगड़ा हुआ है। पेट की खराबी के कारण दादाजी के खाने-पीने में भी ढील आ गई थी। इसलिए उनका शरीर कमजोर हो गया है। यहाँ का मौसम भी कभी गर्मी, कभी ठंड तो कभी बरसाती हो जाता है, इसलिए बुखार और सर्दी के भी हल्के लक्षण आ गये हैं। तबियत को पूर्णतया ठीक होने में कुछ समय तो लगेगा ही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-2436271956218841209?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/2436271956218841209/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/2436271956218841209'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/2436271956218841209'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='दादाजी की खराब तबियत'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-1138693277565952540</id><published>2009-05-25T22:54:00.006+05:30</published><updated>2012-01-05T01:59:53.814+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दादाजी'/><title type='text'>मेरे दादाजी</title><content type='html'>कई लोग आश्चर्य करते हैं कि मैं अपने दादाजी के साथ रहता हूँ। पर यह सच है। दादाजी मेरे साथ कोई १ साल से ज्यादा समय से रह रहे हैं। शुरूआत मेरी मम्मी से हुई थी। मम्मी कुछ महीने मेरे साथ रहीं और वापस घर चली गई। दीदी को फुरसत मिली तो वह भी कुछ दिन मेरे साथ रह ली। परन्तु दादाजी ही थे जो मेरे साथ लम्बे समय तक रहना चाहते थे। कारण मेरी कमजोर सेहत कह लीजिए या फिर मेरा अकेलापन। मैं दादाजी का शुरू से चहेता भी रहा हूँ। बस, हो गई मेरी और दादाजी की जोड़ी फिट, और हिट भी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादाजी पिछले साल की फरवरी माह में यहाँ आए थे। बीच में दुर्गा-पूजा और दीवाली के अवकाश को छोड़ दें तो सारा समय वो मेरे ही साथ थे। दादाजी पेशे से व्यापारी थे, जिन्होंने अपनी कड़ी लगन और मेहनत से काफी धन अर्जित किया, और उनका सद्उपयोग भी। मन, तन और धन से पूर्णतः धर्म के प्रति समर्पित दादाजी हमेशा से ही दान-पुण्य और पूजा-पाठ में लगे रहे। दादाजी की उम्र करीब 85 से 90 साल के बीच में होगी। अपने जीवन का लगभग सारा समय उन्होंने या तो घर पर (जमालपुर, बिहार) या फिर बासुकिनाथ (वैद्यनाथ धाम के पास शिव भगवान का एक तीर्थ-स्थल) में बिताया है। उनके जीवन में यह पहली बार है कि वो घर से दूर इतने दिनों तक रह रहे हैं। शारीरिक रूप से मेरे दादाजी स्वस्थ हैं, हालाँकि उनके कमर में कुछ सालों पहले एक घातक फ्रैक्चर होने के कारण हल्का भारपन बना रहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादाजी के प्रतिदिन का कार्यक्रम सरल-सा है। सुबह 2:30 से 3:30 के बीच में उठना और नहा-धोकर सीधे पूजा पर बैठ जाना। पूजा की प्रक्रिया थोड़ी लम्बी चलती है। इसमें देव-देवताओं की अर्चना और कर्मों का पश्चाताप, गुरूजी के लिए भजन और योग शामिल हैं। लगभग 4 घंटे बाद पूजा कोई 8 बजे खत्म होती है। कोई एकाध घंटा विश्राम करने के बाद वो अपने रोज के कार्यों में लग जाते हैं। इसमे अपने पोते के लिए (यानि मेरे लिए) भोजन तैयार करना, घर ठीक करना और नींद से मुझे उठाना शामिल है। कोई 11-12 बजे दादाजी का नाश्ता और दोपहर का खाना एक साथ ही होता है। इसके पश्चात दादाजी आराम करते हैं और समय मिलने पर गीतापाठ भी कर लेते हैं। धूप छटते ही दादाजी के शाम का कार्यक्रम शुरू होता है। कोई 4 बजे शाम को दादाजी टहलने के लिए निकलते हैं। कोई 4-5km चलने और तीन-माला घर की सीढियाँ चढते-चढते थक के लगभग चूर हो चुके दादाजी 6 बजे तक घर लौटकर आ जाते हैं। तत्पश्चात एक ग्लास शर्बत और कुछ नाश्ता करने के बाद ही उन्हें थोड़ा चैन मिलता है। रात का खाना भी मेरे दादाजी ही बनाते हैं। हालाँकि खाना बनाने का समय मेरे ऑफिस के लौटने के समय पर निर्भर करता है, फिर भी 9-10 बजे तक रात्री-भोजन हो ही जाता है। रात को ज्यादा नींद तो नहीं आती, पर दादाजी आराम करने की भरसक कोशिश करते हैं। जो भी हो, अगली सुबह 3 बजे यही कार्यक्रम पुनः शुरू हो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भागती जिन्दगी में ज्यादा समय तो मिलता नहीं, फिर भी दादाजी के साभ रोचकपूर्ण संवाद होते रहते हैं। चाहे वो रोजमर्रा की जिन्दगी हो या फिर उनके लम्बे जीवन का अनुभव, इनसे मुझे काफी ज्ञान की प्राप्ति हुई है। दादाजी के विशय में कई बातें तो मैंने बचपन में भी जानी थी, पर इनका अर्थ और मूल्य अब मुझे समझ में आ रहा है। इन्हीं कुछ लम्हों को मैं सबके साथ बाँटना चाहता हूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-1138693277565952540?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/1138693277565952540/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/1138693277565952540'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/1138693277565952540'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='मेरे दादाजी'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-2330915885511896548</id><published>2009-04-13T00:14:00.002+05:30</published><updated>2009-05-26T00:11:00.439+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भजन'/><title type='text'>भक्ति कुंज</title><content type='html'>॥ॐ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भक्ति कुंज में सिर्फ़ ईश्वर की आराधना होती है। जैसे डिस्को में डांस और मयूज़िक साथ-साथ होते हैं, उसी तरह भक्ति कुंज में भजन और लीला दोनो के बिना मज़ा नहीं आता। वैसे तो ईश्वर की मूर्ति हर मंदिर में है। और हर मंदिर में प्रतिदिन भजन और पूजन किया ही जाता है। परन्तु जब किसी नुक्कड़ में हारमोनियम, तबला और करताल के साथ भजन मंडली बैठती है, तो वहोँ भक्तों की भीड़ जमा हो जाती है। संक्षिप्त में कहूँ तो हमारा घर एक डिस्को थिएटर ही है, बस फ़र्क इतना कि फिल्मी और अंग्रेज़ी गानों की जगह भजन और किर्तन बजते हैं, और राम की लीला में लोग झूम उठते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पिताजी का शुरू से ही पूजा अर्चना की तरफ झुकाव रहा है। हालाँकि वो रोज़ दो घंटे पूजा तो कर ही लेते होंगे, और जिसके भोग का रस उन्हें प्रतिदिन प्राप्त हो भी रहा था, पर शायद उसमे कहीं भक्ति का रस सूखा-सा जा रहा था। लगभग इस सदी की शुरूआत में पापा ने अपने चबुतरे पर रामायण-पाठ की पुनर्शरूयात की (इसी चबुतरे पर हमारे दादाजी ने कई सालों तक रामलीला करवाई थी, जो कुछ कारणों से लगभग दस साल तक बंद रही) । भक्ति और संगीत के गुण पिताजी में मौजूद हैं ही, साथ में कुछ करीबी दोस्तों ने मिलकर हाथ बँटाया, और हो गयी मंडली तैयार। कहते हैं ढूँढने से भगवान भी मिलते हैं, भक्तों की तो कमी ही नहीं दुनिया में। पिताजी गाने-बजाने का सामान तो खरीद लाए ही, मंडली में हारमोनियम और तबला के पारखी भी जुट गए। फिर क्य़ा था, दो लाउडस्पीकर छत के ऊपर लगा दिया और माताजी ने अपनी सहेलियों को मंच पर बुला लिया। सबने लिया प्रेम से श्रीराम का नाम और हो गई ईश्वर-वंदना शुरू।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग दस साल से हर रविवार हमारे दरवाजे पर रामायण-पाठ का आयोजन होता है। बीच-बीच में पिताजी नाना प्रकार के यज्ञ और पूजा-पाठ बड़े स्तर पर करवाते रहते हैं। माताजी ने गायत्री माता की दीक्षा ली है, इसलिए हर गुरूवार-संध्या को गायत्री माता की आराधना भी होती है। बहुत कम, पर जब भी मैं इस बीच घर गया हूँ, इस रासलीला का अंग बनने का सौभाग्य हमेशा प्राप्त हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;॥ॐ॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-2330915885511896548?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/2330915885511896548/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/2330915885511896548'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/2330915885511896548'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='भक्ति कुंज'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-8010341375697338728</id><published>2009-03-15T18:01:00.000+05:30</published><updated>2009-03-15T18:07:11.472+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग़ुलाम अली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग़ज़ल'/><title type='text'>बहारों को चमन याद आ गया है...</title><content type='html'>ग़ज़ल - ग़ुलाम अली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहारों को चमन याद आ गया है,&lt;br /&gt;मुझे वो गुलबदन याद आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लचकती शाख ने जब सर उठाया,&lt;br /&gt;किसी का बाकपन याद आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी सूरत को जब देखा है मैंने,&lt;br /&gt;उरुजू-ऐ-फिक्र-ओ-फन याद आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिले वो अजनबी बनकर तो रफ़्वयत,&lt;br /&gt;ज़माने का चलन याद आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;बहारों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चमन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;याद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;&lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुलबदन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;याद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-8010341375697338728?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/8010341375697338728/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/03/blog-post_5188.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/8010341375697338728'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/8010341375697338728'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2009/03/blog-post_5188.html' title='बहारों को चमन याद आ गया है...'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-7479467175453684310</id><published>2008-09-17T10:45:00.001+05:30</published><updated>2009-06-06T15:27:06.472+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दादाजी'/><title type='text'>काफ़ी देर हो गई.....</title><content type='html'>आज मेरे दादाजी घर चले गए, वो भी अकेले!! हमारे घर में दुर्गा-पूजा धूम-धाम से मनाया जाता है, और तब-से जब दादाजी का जन्म भी नही हुआ था।  इसलिए उनका इस त्यौहार में जाना जरुरी था। दादाजी मेरे साथ पिछले ७ महीने से रह रहे हैं, पर समय का तो पता ही नहीं चला, कब और कैसे निकल गया। घर &lt;span&gt;से &lt;/span&gt;स्टेशन की तरफ़ निकलने से पहले भी मैंने रोज की तरह दादाजी के साथ बहस की, फर्क नही पड़ता किस बात पे, बस की, हालाँकि ऑटो में दोनों शांत बैठे रहे। स्टेशन पहुंचे तो गाड़ी प्लैट्फौर्म १ पे खड़ी थी, इससे पहले दादाजी मुझे कुछ बोलते हम दोनों ट्रेन की तरफ़ चल दिए। मेरे दादाजी  को ट्रेन और स्टेशन से कुछ ज्यादा ही लगाव है, जिसके बिना उनके व्यवसाय की कहानी &lt;span&gt;शायद &lt;/span&gt;अधूरी है। रेलवे का नाम लेते ही वो एक्स्ट्रा-एक्टिव हो जाते हैं। पर आश्चर्य की बात तो ये है की आज दादाजी बिल्कुल शांत थे। पता नही उनके मन में क्या चल रहा था! ७ महीने घर से बाहर वो आज तक अपनी ज़िन्दगी में नहीं रहे, बस एक बार १ महीने के लिए अमृतसर में रहे थे, जब चाचाजी की तबियत ख़राब हुई थी। वह इंसान जो अपने घर के इतने पास रहे, उसके लिए उससे बिछड़ना और फिर मिलना कितना कठिन समय होता है, शायद उतना ही, जितना मेरे लिए &lt;span&gt;पहली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;&lt;/span&gt;होस्टल से घर जाना! मुझे लगा दादाजी के दिमाग में बस यही चल रहा था - घर  का नक्शा, बारी की क्यारियां, बुलबुल की पढाई, घर का पूजा-पथ,  यज्ञ और बूढे बुजूर्ग दोस्त मंडली। कभी उन्होंने सोचा भी न होगा की पोते से मिलने के चक्कर में वो इतने लंबे अरसे तक इन सब से दूर रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ इन महीनों दादाजी मेरा अटेंशन पाने की कोशिश करते रहे, आज ट्रेन में वही कोशिश मैं कर रहा था। गाड़ी का समय हुआ जा रहा था, मैंने दादाजी को प्रणाम किया और स्टेशन के बाहर निकल पड़ा। याद नही मैंने डेढ़ घंटे की बस यात्रा में कितनी बार गायत्री मंत्र का उच्चारण किया, बस इसलिए की दादाजी  को ट्रेन में कोई परेशानी ना हो। मन में &lt;span&gt;शाँति &lt;/span&gt;तब ही मिली, जब दीदी ने फ़ोन करके बताया कि दादाजी ठीक-से चेन्नई पहुँच गए हैं। दीदी ने दादाजी को कुछ खाने-पीने का सामान दिया और उनको खुशी-खुशी विदा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी रात हो चुकी है और मैंने खाना भी खा लिया है। १० बज रहे हैं पर घर जाने का दिल नही कर रहा। सोचता हूँ आज दोस्त के घर ही रुक जाऊंगा। कल से तो &lt;span&gt;फिर &lt;/span&gt;वही कहानी होगी, हम और हमारी तन्हाइयां और उनके साथ हमारा लैपटॉप !!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-7479467175453684310?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/7479467175453684310/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2008/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/7479467175453684310'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/7479467175453684310'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='काफ़ी देर हो गई.....'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='2' height='1' src='http://3.bp.blogspot.com/_IiF_It76TT0/SdC75G7E1hI/AAAAAAAACsI/4r4BYK6LUU8/S220/dscn2210.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3497939089625866544.post-242252269804880611</id><published>2007-09-29T14:58:00.000+05:30</published><updated>2012-01-03T16:23:09.285+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुटकुला'/><title type='text'>किसी शादी में...</title><content type='html'>&lt;span style="font-style: italic;"&gt;ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन की शादी हाल ही में हुई है। बाहर दो लोगों के बीच की बातचीत॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : भैया, बहुत भूख लगी रेली  है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : गधा! अभी तो खाया तूने। फिर से भूख लग गयी तेरे को? .... वैसे भूख तो मुझे भी लगी रेली है....&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : भैया ये गाना कहाँ बज रेला है?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : लगता है किसी की शादी हो रेली है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : आइला! बाप और बेटी की शादी! ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन!&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : गधे! अमिताभ बच्चन नही अभिषेक बच्चन है, उसका बेटा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;: पर अमिताभ बच्चन को क्यों इतना बड़ा करके लिखे रेला है उधर?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : अच्छा चल अन्दर चलते हैं, बहुत बढ़िया खाना बनाया होगा शादी में।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : पर भाई अपने को बुलाया किधर?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : अरे चल ना! मटन, चिकन, पनीर, कबाब, सब होगा वहाँ, मज़ा आ जाएगा!&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : पर भाई अन्दर तो बहुत बडे लोग होंगे, अपने को अन्दर जाने देगा?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : अरे वो ऐश्वर्या राय है तो तू ऐश्वर्या के भाई से कम थोड़े ही है :D चल आजा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : देखो भैया, हमें सबकुछ बुलाओ पर ऐश का भाई मत बुलाओ, कहे देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : अच्छा चल अन्दर चलते हैं, कोई कुछ नही बोलेगा, डरता क्यों है? मैं हूँ ना।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;छोटू&lt;/span&gt; : ठीक है आप कहते हैं तो...&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भैया&lt;/span&gt; : देख वो family जा रही है, चल उसके पीछे पीछे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;दोनो अन्दर चले जाते हैं...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3497939089625866544-242252269804880611?l=evichar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://evichar.blogspot.com/feeds/242252269804880611/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2007/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/242252269804880611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3497939089625866544/posts/default/242252269804880611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://evichar.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='किसी शादी में...'/><author><name>सौरभ भारती (Shaurabh Bharti)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06292147389456706968</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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